Tuesday, September 6, 2011


Revolutionise Education
Revolutionise Education By Osho
Reward intelligence and effort, and not rote learning, says OSHO.

The education system we follow in India was started by the British government to create clerks. No government wants intelligent people… then it is easier to exploit them, rule them, to avoid any revolution, and easier for mediocre people to become leaders. The British government managed beautifully.

For 25 years, for almost one third of his life, a person is processed in such a way that he turns out either to be a station master, a head clerk, or a postmaster. These were the needs of the government.

All the gold medallists in the universities disappear — you never hear of them again. In the university they get gold medals, but in life they become head clerks but don’t go further.

Reformation Not Enough
The whole system is wrong. So it is not a question of reforming it; it is a question of revolutionising it. A real educational system will take care of the whole individual; this education system takes care only of the mind. The whole individual means the body, mind, heart and soul. Unless education takes care of all these four in a balanced way, it cannot create a whole individual.

For example, the university does nothing to the body. Much needs to be done with the body because everything else is based on it. It needs not only exercises, yoga, aikido and other systems of training, but it also needs a systematic, scientific approach to food — because what you eat, you become.
We should make it a point that non-vegetarian food is not allowed in the universities because to kill, to do violence just for food, is so ugly and inhuman.... Non-vegetarian food makes you insensitive, it makes you hard. And it creates anger and violence which can be easily avoided.

Couch Potato Syndrome
Taking care of the body means the body should be given adequate exercise. Students are sitting in the universities the whole day and in the night they have to do their homework and they have to go to the movies. They become just sitting idiots.

The body, by nature, is not created just to go on sitting. Students should be walking, running, swimming, climbing trees and mountains. Their bodies should be given a chance to achieve their natural potential. But the body is a neglected part; nobody is interested in it. We live in the body, but we don’t think about what we are eating and whether we exercise.

Scientists say that as far as the body is concerned it seems to have the capacity to go on renewing itself for 300 years. So if people are dying at 70, something is wrong. Nothing is wrong with the body; we are just giving it the wrong food, no exercise or the wrong exercise. My first concern is the body. Experts in diet should be consulted. Taste cannot be the decisive thing; taste can be added to anything. But the basic thing should be the science of the body.

Doubting Is A Good Sign
Professors should give more emphasis to discussion, to doubt, and they should destroy completely any textbook belief system. Those books should be removed; then you would see an explosion of intelligence. But to doubt seems to be doing something evil, and to have faith seems to be spiritual and religious. Just the reverse is the case. To have faith is evil; to doubt is natural. Go on doubting until you come to an indubitable fact.

So universities have to change their whole attitude about doubt and belief. And it is not important that you pass the examination; those five examination questions can be answered by a person who knows nothing else.

I am against examinations because they create a totally wrong approach. The student becomes interested only in passing the examination. So rather than reading the book, he looks for a shorter version or a key. The professor has answered questions which are probable examination questions, so the students read just these and nothing else. It is the examination system that creates a wrong attitude.

My idea is that students should be given credit by each professor, every day, just the way they take attendance. And the credit should be given according to the intelligence shown by the student.

Rote Learning, A Waste
Our whole system depends on how much you can memorise, not on intelligence. But memory is not something great; a computer can do it. And soon there will be no need of any memory; you can just have a small computer in your pocket and any answer you need will be immediately available. Why waste time and life and torture people about memory when memory has nothing to do with intelligence?

Right now, our education system is based on memory. I would like it to be based on intelligence. Every professor should give credits every day, not just at the end of the year, because that creates trouble. Students don’t take any interest for the whole year; just for one month at the end they are torturing themselves trying to learn everything at once.

I would like them to get credits every day, and if somebody is intelligent enough to get enough credit in six months to pass to another class, why make him waste six months more in the same class? The moment he gets the required credits, he moves to the next class. So nobody passes, nobody fails; people simply move.

Then the university becomes a moving phenomenon. People are moving according to their intelligence, and there are no fixed barriers. Instead of memory, reward intelligence. People of good memory need not be people of good intelligence. Memory functions mechanically and intelligence functions non-mechanically.

13/7 helpless mumbai and hopeless government

मुंबई फिर दहली. मुंबई के सीने पर फिर से आतंकवादियों ने हमला किया. मुंबई के दादर, ओपेरा हाउस और झवेरी बाज़ार में सिरिअल ब्लास्ट में करीब २० की मौत.

१३ जुलाई बुधवार की शाम को जब लोग अपने दफ्तरों से अपने घर पहुंचे या रास्तों में थे तब टेलीविजन स्क्रीन या मोबाइल के एसएम्एस पर यह खबर देख कर उनका चौकना लाजमी था पर देश की आर्थिक राजधानी में रहने वाले हर एक शख्स की जुबान और आँखों में एक सवाल भी था आखिर हर बार हम मुंबईवासी ही क्यों आतंक के शिकार होते हैं? देश के हर कोने से यहाँ आकर दिन रात मेहनत करके क्या हमें सुरक्षित जीवन जीने का भी अधिकार नहीं है? देश में सबसे ज्यादा टैक्स देने के बाद भी क्या हमे थोड़ी सी सुरक्षा नहीं मिल सकती क्या? क्या मुंबई भी पाकिस्तान के शहरों कि तरह हो गयी है जहाँ दिन पत्रिदीन धमाके होते हैं? क्या हेमे अब धमाकों के साथ जीने कि आदत डाल लेनी चाहिए? क्या मुंबई भी पाकिस्तान के शहरों कि तरह हो गयी है जहाँ दिन पत्रिदीन धमाके होते हैं? क्या हेमे अब धमाकों के साथ जीने कि आदत डाल लेनी चाहिए?

मुंबई वासियों को अपने इन सवालों का जवाब कहीं भी नहीं मिल रहा है और इस हताशा और गुस्से में मुंबई में सभी के मोबाइल पर एक एसएम्एस घूम रहा था ' हम सरकार से कसाब और अफज़ल गुरु को फासिं देने कि मांग नहीं करते पर कम से कम सरकार हमें उनके जैसी सुरक्षा तो दे.' मुंबई वासियों कि भड़ास इस एसएम्एस से सीधे झलकती है.

जिन जगहों पर ये धमाके हुए वे मुंबई के सबसे अमीर इलाकों में से एक हैं जहाँ पर सोने (झवेरी बाज़ार), चांदी (दादर) और हीरे (ओपेरा हॉउस) का करोडो का व्यापार होता है. मुंबई का सबसे पुराना मार्केट होने के कारण यहाँ पुरे देश के व्यापारियों का जमघट लगता है साथ ही यहाँ हर समय भीड़ रहती है. जिसके चलते झवेरी बाज़ार (२००३) और दादर (१९९३) में ये हमले दुबारा हो चुके हैं. हर बार आतंकवादियों ने ऐसी जगहों को निशाने पर लिया है जहाँ पर ज्यादा से ज्यादा जान और माल का नुकसान हो. मुंबई का धनाढ्य वर्ग जो इन बाज़ारों में व्यापार करते हैं या यहाँ पर अपने ऑफिस खोल रखे हैं या वे जो यहाँ इन व्यापारियों को अन्य सुविधाए मुहैया करते हैं वे ही इन हमलों के ज्यादातर चपेट में आते हैं.

ऐसा नहीं है कि यहाँ पर दुनिया में दुसरे नंबर कि पुलिस कहलाने वाली मुम्बई पुलिस हाँथ पर हाँथ धरे बैठी रहती है. मुंबई में अपराधिक घटनाएँ ना हो इसके लिए यहाँ लगभग १२ महीने धारा १४४ लगी रहती है और कभी कभी रेलवे स्टेशन पर भी चेक्किंग क जाती है साथ ही शहर के हर प्रवेश देवर पर गाड़ियों और मुसाफिरों कि तलाश कि जाती है जिसके चलते यहाँ के पुलिस वालों को करीब १६ घंटे रोजाना ड्यूटी करनी पड़ती है पर इसके बावजूद भी मुंबई को आतंकी हमलों से नहीं बचाया जा सका गया है.

ऐसा नहीं है कि यहाँ कि सरकार ने पिछले धमाकों से कुछ नहीं सीखा है पर जितनी सक्रियता सरकार को उन हमलों के बाद दिखाई जनि चाहिए थी उतनी सक्रियता नहीं बरती गयी है. मुंबई पुलिस के पास समुद्री तटों पर सुरक्षा के लिए उसे बोट दिए गए हैं पर उस पर सवार पुलिस अफसर मरीन पोलिसिंग में ट्रेंड नहीं हैं और समुद्री सीमा कि सुरक्षा किसी एक एजेंसी के पास नहीं है इसमें तट रक्षक डाल, नौसेना और लोकल पुलिस कि भागीदारी है पर तीनों अजेंसिओं के कार्य क्षेत्र कि सीमायें अलग अलग हैं और इनके बीच तालमेल का आभाव है

वहीँ दूसरी ओर राज्य के ख़ुफ़िया विभाग को एक साइड पोस्टिंग या पनिशमेंट पोस्टिंग के रूप में देखा जाता है जिसके चलते इस विभाग में अधिकारी बेमन से काम करते हैं. मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र पुलिस के बीच में कई विभाग हैं तो खुब्फिया जकारियां इकठ्ठा करते हैं पर आपस में उनका तालमेल ना होने के कारण सब बेकार जाता है. जिसका नतीजा इस तरह के धमाकों के रूप में सामने आता है. शहर कि सुरक्षा को लेकर कई समितियां बनायीं गयीं है पर उनपर अमल केवल कागज पर ही होता है..

इस मुद्दे पर डा. पी एस पसरीचा जो महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक रह चुके हैं का कहना है की मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है और यहाँ पर जनसँख्या का घनत्व पुरे देस में सबसे ज्यादा है इसलिए जितना असर इन धमाकों का यहाँ पर मिलता है वह देश के अन्य शहरों में नहीं होता है. यहाँ पर हमला करने पर जितनी सुर्खियाँ, डर, नुकसान आतंकवादी संगठन पते हैं वह अन्य कहीं नहीं मिल सकता है. मुंबई में हमला करने से यहाँ पर सीधे आघात व्यापार, विदेशी निवेश, पर्यटन और साम्प्रदायिकता पर पड़ता है.

मुंबई को सुरक्षित रखने के लिए अब हमें पुलिस विभाग में मैन पॉवर पर नहीं बल्कि टेक्नोलोजी पर देना होगा. देश को अब अमेरिका जैसे विकसित देशों की तरह आधुनिक होना पड़ेगा. हमें अब एक मॉडर्न कंट्रोल सविलेंस सेंटर की जरूरत है जहाँ से सारे शहर पर नजर रखी जा सके. मुंबई जैसे शहर को सबसे पहले उसके कोस्टल सिक्युरिटी को चाक चौबंद करने की जरुरत है क्योंकि ये चारो तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है. मुंबई पुलिस को एक अलग मरीन पुलिस की जरुरत है जो पानी के अन्दर सभी कारनामे कर सके. समुद्र में जाने वाले हर छोटे बड़े जहाज को एक इलेक्ट्रोनिक पहचान पत्र देना होगा ताकि किसी अज्ञात जहाज की एंट्री मुंबई की समुद्री सीमा में ना हो पाए इसके साथ ही समुद्री किनारों पर निगरानी के लिए जिम्मेदार सारी एजेंसिओं के बीच तालमेल भी बढ़ानी होगी. पुरे देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी अब केवल प्रशाशन के भरोशे नहीं छोड़ा जा सकता, विकसित देशों की तरह अब हमें भी काउंटर टेररिज्म के लिए अब प्राइवेट सिक्यूरिटी एजेंसियों के साथ भी हमें तालमेल बैठाना होगा. देश में होमगार्ड को भी महत्त्व मिलना चाहिए.

हमारे देश में आतंकवाद से लड़ने के लिए काफी कठोर सजा का प्रावधान होना चाहिए और इस कानून का गलत इस्तेमाल ना हो इसलिए इसका गलत इस्तेमाल करने वालों के लिए भी काम से काम ७ से १० साल के कारावास का प्रावधान होना चाहिए ताकि किसी बेगुनाह के साथ भी अन्याय ना हो सके.

मेरे ३८ वर्ष के पुलिस करियर में मैंने ये सीखा है कि आपको इंटेलिजेंस किसी आई बी या ख़ुफ़िया एजेंसी से नहीं मिलते हैं. आतंकी गतिविधियों कि ख़ुफ़िया ख़बरें जनता से आती हैं इसलिए पुलिस विभाग को जनता के मन में इस तरह कि भावना जगानी होगी कि जनता पुलिस को अपना दोस्त समझे और उससे अपनी हर बात जाहिर करे. साथ ही राजनितिक पार्टियों को मिल कर एक साथ आना चाहिए और इन समयों में एकता का और सदभाव्ना कि mishal पेश करनी चाहिए.

डा. पसरीचा का कहना है कि आतंकवाद एक सतत प्रक्रिया है और इसकी कोई गारंटी नहीं है कि जो कुछ आज मुंबई में हुआ है वह किसी अन्य शहर में नहीं होगा. इसे रोकने के लिए हमें सतत प्रयास करते रहना पड़ेगा.

भाजपा के पूर्व सांसद किरीट सोमैया १३ जुलाई को हुए ब्लास्ट कि जाँच को तेजी से आगे बढ़ने कि मांग सरकार से कर रहे हैं और इन्हीं के चलते जुलाई २००६ को हुए ट्रेन ब्लास्ट के पीड़ितों को भी न्याय दिलाने के लिए कई स्तर पर लड़ रहे हैं. सोमैया का कहना है कि मुंबई पर बार बार हमला करने के पीछे पहला कारन ये है कि यहाँ पर हमला करने से आतंकवादी संगठनों को ग्लोबल पब्लिसिटी मिलिती है और देश कि आर्थिक राजधानी होने के नाते यहाँ पर इसका असर भी ज्यादा देखने को मिलता है. रही बात उनके बार बार हमले का तो यहाँ कि सरकार का ये नाकारापन है जिसके चलते अब तक १९९३ के धमाकों के गुनाहगारों को हम सजा नहीं दिला पाए ज्सिके चलते उनका आत्मविश्वास और भी बढ़ जाता है. दूसरा कारण यहाँ के नेता किसी भी आतंकवादी हमलों को राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग देने में देर नहीं लगते हैं और यही कारण है कि अच्छे पुलिस अधिकारी भी इन मामलों को सुलझाने से डरते हैं. तीसरा हमारे यहाँ कोई भी मामला इतने सालों तक चलता है कि लोग उस घटना को भूल जाते हैं और न्याय मिलना ना मिलना एक जैसा ही हो जाता है.

मुंबई ब्लास्ट और राजनीती...

१३ जुलाई के काले बुधवार को जहाँ एक ओर जनता अस्पतालों में अपनों को ढूंढ़ रही थी, कहीं लोग रक्त दान और घायलों कि सेवा में लगे थे वहीँ राज्य के भाजपा नेता पुरे दल बल के साथ अस्पतालों के बाहर कांग्रेस सरकार हाय हाय के नारे लगा रहे थे. दूसरी ओर उत्तर भारतीयों से खार खाए मनसे के अध्यक्ष राज ठाकरे ने ब्लास्ट का ठीकरा मुंबई में आने वाले परप्रान्तियों के सर मढ़ा हलाकि उन्होंने बाद में अपनी इस वन्क्तव्य का खंडन भी किया.

वहीँ राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने आर आर एस को बम कि फैक्ट्री कहते हुए और हिन्दू संगठनों कि ओर इशारे करते हुए उनकी भी जाँच करने को कहा जिसके बाद उनकी मध्य प्रदेश में उन्होंने ने विरोध झेला और विरोधियों को पीटने के चक्कर में खुद कि भी पिटाई और कपडे फ़दवा बैठे.

केंद्र सरकार में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने यह कह कर अपनी और सरकार कि खिल्ली उदवाई कि इस ब्लास्ट कि ख़ुफ़िया खबर ख़ुफ़िया विभाग के पास नहीं थी. उन्होंने ये भी कहा कि मुंबई में २६-११ के बाद शांति थी और ये धमाका करीब दो साल के बाद हुआ है.

राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने ये बयां देकर राजनितिक माहौल गरमा दिया कि कांग्रेस ने गृह विभाग सहयोगी पार्टी एनसीपी को देकर गलती की यह विभाग कांग्रेस को अपने ही पास रख्ना चाहिये था. वहीँ हर बार कि तरह नाकाम गृहमंत्री आर आर पाटिल करीब दो घंटे के बाद मुंबई पहुंचे. पाटिल जैसे ही नागपुर के लिए फ्लाईट से मुंबई से निकले ही थे वैसे ही उनके सहयोगी के मोबाइल पर ब्लास्ट कि सूचना आई पर फ्लाईट उनके लाख कोशिशों के बावजूद नहीं रुकी और उन्हें नागपुर जाकर वापस मुंबई आना पड़ा.

ब्लास्ट के बाद...

इस धमाके के बाद ओपेरा हॉउस के हीरा व्यापारी जल्दी ही मुंबई के पौस इलाके बांद्रा कुर्ला काम्प्लेक्स में करीब साल भर से बन कर तैयार भारत बोर्स हॉउस में शिफ्ट होने का मन बना लिया है. कुछ मुंबई और सूरत (जहाँ पर सबसे ज्यादा हीरे का व्यापार और इस से जुड़े अन्य व्यवसाय है) के व्यापारियों ने सरकार से मांग कि है कि उनके लिए सूरत के एअरपोर्ट पर दुबई और मुंबई के लिए कम से कम एक सीधी विमान सेवा शुरू कर दी जाये तो वे मुंबई से सूरत शिफ्ट हो जाएँ जहाँ पर उन्हें कम लागत में सुअर्क्षित रूप से व्यापार करने का साधन हो जायेगा. फ़िलहाल उन्हें रोजाना कीमती हीरों के साथ मुंबई और सूरत के बीच करीं ६ घंटे का ट्रेन का सफ़र करना पड़ता है जो कभी कभी खतरनाक भी हो जाता है.

वहीँ पुलिस ने पुरे शहर में ५००० नए सी सी टी वी कैमरा लगाने में जुट गयी है ताकि पुरे शहर पर नजर रखी जा सके. हालाँकि इस धमके में भी सी सी टी वी फुटेज में संदेहास्पद आतंकी का विडियो मिला है पर सवाल ये है कि का केवल सी सी टी वी कैमरा लगाने से ही काम नहीं चल पायगा क्या इन फुटेज पर नजर रखने के लिए कोई अधिकारी कि नियुक्ति भी की जाएगी?

मुंबई में अब तक हुए धमाके...

१९९३ के सीरिअल धमाके : १२ मार्च १९९३ को दोपहर के १:३० और ३:३५ के बीच मुंबई में १३ स्थानों पर हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों से मुंबई को पहली बार इस बम कि भयावहता का एहसास हुआ था जिसमे सरकारी आंकड़ों के मुताबिक २५७ लोगों कि जाने गयीं तथा ७१३ लोग घायल हुए. इस धमाके कि सुनवाई १९९५ में शुरू हुई और ६८६ गवाहों को सुनने और ३५००० पन्नों के सबूतों को पढने के बाद इसके नतीजे ११ साल बाद आये जिसमे १२९ दोषियों में से १०० को सजा हुई.

२००३ गेट ऑफ़ इंडिया और झवेरी बाज़ार धमाके: गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए २५ अगस्त २००३ को किये गए इस धमाके में ५३ लोगों कि जाने गयीं और करीब १५० लोगों कि जाने गयीं.

२००६ सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट

११ जुलाई २००६ को हुए इस ब्लास्ट में ११ मिनट में सात धमाके लोकल ट्रेन में हुए जिसमे १८७ जाने गयीं और ८०० से भी ज्यादा घायल हुए. १९९३ के बाद मुंबई वासियों ने धमाके कि भयावहता देखि.

२६/११ मुंबई हमला

२६ नवम्बर २००९ को हुए इस हमले में १६४ कि मौत हुई और करीब ३०० से ज्यादा हायल हुए. यह पहली बार हुआ जब समुद्र के रस्ते आये पाकिस्तानी आतंकियों को हमने देखा और १० अतान्क्यों में से एकमात्र आतंकी कसाब अब भी मुंबई के आर्थर रोड जेल में बंद है.

Thursday, March 3, 2011

Crippled boy dreams of sprinting again

Thursday, March 03, 2011
By Kaptan Mali
Thirteen-year-old Deepak Soni was a class IV student and like other boys of his age liked to run, walk and dance. Since the last two years, he is confined to a broken bed. As the family couldn’t afford Rs. 2 lakh, he has not yet been treated. 

Two years’ ago, August 13, 2009 Janmasthami, Deepak was rushing out of the municipal school at Kandivli along with other kids, during lunch recess when he fell on his back and suffered minor injuries. Afraid of being scolded, Deepak didn’t talk about his fall at home. The injury aggravated and caused serious damage to his backbone, which is termed as intramedullary neoplasm.  When asked about his ambitions, Deepak’s eyes brighten as he says, “I want to study more and become a doctor and cure people who are living a life like me. I want to play outside. I don’t want to be confined to bed. I want to be with my friends.”

Deepak’s father, Omprakash Soni, a construction labourer, says “I am so unfortunate not to be able to save my son’s future. I earn around Rs 100 a day and my job is not regular. I can barely manage the food expenses. The medical expenses have put me in debt.”

Omprakash further revealed that he had approached local corporator Kamlesh Yadav, Local MLA Yogesh Sagar and MP Sanjay Nirupam but didn’t get any help from them. MLA Yogesh Sagar gave him Rs.2000 and offered more help, but when he again went there he was told that they have not opened a social service center to help people like him.

Omprakash visited several private as well as government hospitals but couldn’t get Deepak cured. He was only referred from one doctor to another. Even a government hospital like KEM, after providing basic treatment, asked Omprakash to deposit Rs.2 lakh for further treatment.

Deepak’s mother, Santoshee Soni, who helps by doing imitation jewellery work from home said, “My son still wants to study, but he can’t go to school. I tried to arrange for tuition teachers but they ask for high rates which we cannot afford. We are not even in a position to buy him a wheelchair.”

Munna Sheikh, a social worker from the area, who has been running from pillar to post to help Deepak’s family said, “All I want is that the future of this boy shouldn’t get ruined just because his parents can’t afford his treatment costs. Wastage of Deepak’s life is like a curse on the nation. I request people to come forward to let Deepak stand on his feet again.”  

Deepak’s desperate circumstances …
  • Deepak is the second child of his parents
  • His elder sister is deaf and dumb
  • His father is a construction worker earning Rs.100 per day
  • His mother works from home for an imitation jewellery firm
  • Deepak has serious injury on his backbone
  • He needs around Rs.2 lakhs for treatment

Friday, February 18, 2011

For a better Thane

Divide and prosper?

Friday, February 04, 2011
By Kaptan Mali
Demand to split Thane district for overall development gets stronger

Thane, the satellite city of India’s economic capital Mumbai, has transformed itself in recent decades from being an industrial and rural area to a fast growing city of multiplexes and high-rises. But, one thing has not yet changed — its tag of being the biggest district in India on the basis of population.

Due to this, authorities are having problems in developing Thane equitably. On the one hand, there is a section of the population that is getting the best of benefits while, on the other hand, people in rural areas like Jawahar-Mokhada and Shahpur are dying of malnutrition.

Thane district is spread over an area of around 9,337 sq. km and is the only district in India where there are seven municipal corporations, five municipal councils, 1,748 villages, 15 tehsils and 37 cities. But a major part of the administration is looked after by the Thane headquarters, which faces problems when it comes to taking care of the entire district. The district is bound by Pune and Ahmednagar in the east, Nashik in the east and northeast, Valsad District of Gujarat and the Union Territory of Dadra and Nagar Haveli in the north.

Often, the residents of these areas have to visit the district headquarters for basic government facilities, which sometimes is a 6-8 hour journey one way.

Further, the district comprises of hilly, coastal, as well as jungle areas, making it even more difficult for officials to manage it effectively. For over two decades, there has been a demand to divide the district in order to make the administration more effective and swift, but nothing has been done so far.

Explained advocate Chitaman Vanga, Member of Parliament from Palghar, “It is too difficult for just one superintendent of police and one collector to handle such a vast area. There must be a division of the district. As per the plan, the government has allocated only Rs.361 crore for the development of rural areas in Thane whereas, for urban development, more than Rs.600 crore has been allocated.” Advocate Vanga also feels that while the total population of Thane district presently stood at around 1.5 crore, once the Churchgate-Dahanu suburban train service begins, it will only worsen the situation.

In 1992, O.P. Sharma, a social activist who has been fighting for the division of Thane for over 25 years, had initiated a movement to make Jawahar Taluka a district. He succeeded partly. Giving the example of Mira-Bhayandar, Sharma explained, “In 1984, Mira-Bhayandar was a Gram Panchayat and in 1995 it became a municipal corporation and now it is competing with Mumbai. So, one can also hope for such type of development in Thane once it is divided.”

Sharma, however, added, “Before coming to the conclusion of dividing the district, the government must do a thorough survey and analysis of the people residing here. There should be three divisions as per its geographical characteristics – hilly, coastal and urban. Also, there must be a headquarter for each division.”

Santosh Giri, a resident of the district, has a different viewpoint though. “The division of Thane will be a costly affair for the government. Instead, they should appoint an additional collector with an IAS rank in each of the three areas of the district and provide them with the responsibility of the entire development of the area. If these people work with full integrity, the area will prosper like other regions of the country.”

A senior Thane IPS officer, on condition of anonymity, commented, “It is true that the division of Thane will help us in managing the district in a more effective way. At present, there should be a separate police commissionerate for Mira Bhayandar and Vasai.

It will reduce the burden of the Thane rural superintendent of police.” When contacted, Thane District Magistrate, A.L. Jarhad, assured, “There has been a demand to divide Thane for the last 15 years. A district planning committee is looking into the issue.”

Thane in numbers
Tehsils: 15
Panchayat samitis: 13
Cities: 37
Municipal corporations: 7
Municipal councils: 5

Police Policing

Relating to the Public: PRO’s at police stations

Monday, November 22, 2010
By Kaptan Mali
The Thane police department has started a new initiative to bring general public and police officials closer and remove the fear of police from the public’s psyche. The Thane police have decided to appoint Public Relation Officers (PRO) who will be the first contact of visitors to any police station.

The initiative started by Thane Police Commissioner SPS Yadav on an experimental basis. The program will be reviewed by the Deputy Commissioners of Police and Yadav in a few weeks and will later be implemented in all the police stations.

The constables who have been assigned the PRO’s job have been trained by senior officials. These PROs will hold the information of all officers and departments including absent officers. Accordingly they will guide visitors. The PRO will also place his remarks on the applications of the visitors which will serve as evidence for both police and the visitors.

Thane police commissioner SPS Yadav told ADC, “At the police stations, the public is found wandering from one department to another because there is no one to guide them. There must be a qualified officer (PRO) to guide them to the right department with their queries.”

According to Yadav there is a fear in the minds of the general public regarding the police department which he wants to eliminate through this initiative. If the general public is treated well by the police it will not only restore their faith in this institution but also help the police in reducing crime and assist in intelligence gathering.

Yadav further added that the PRO will be the first person to interact with the visitors and will note details about the visitor to help us during the investigation or act as references which will increase the accountability of the concerned department.

However police stations across Mumbai have public relations officers but are rarely seen doing their job.

something positive

On the rite path

Saturday, November 20, 2010
By Kaptan Mali
 Antim Samskar Seva specialises in performing the funeral rituals of different religions

In Mumbai’s fast-paced life hardly anyone has the time to even think about others. And then, there are a few like Dr. Ramnik Parekh, who devote their money and time for the dead, to provide them a respectful last rite. Very few in the city know about the procedures for last rites of all the religions. For such people, the Antim Samskar Seva – founded by Dr. Parekh – has the answers.
Dr. Parekh has devoted several years of his life studying the different types of last rite rituals of different religions after that he set up his organisation. Antim Samskar Seva has an air-conditioned hearse equipped with all the essentials required for any last rite with four staff members, who are just a call away. They claim to reach the spot in an hour’s time. In the cities, very few people know how to make a ‘bier’ (wooden stretcher) on which the dead body is taken to the crematorium. Also, there are very few shops where the materials required for it are available.
The organisation provides two types of services, one from hospital to home and second from home to crematorium. In two years since its inception, the Antim Samskar Seva has provided their services to over 350 families from different communities of Hindu, Sikh, Jain, Buddhists, etc. Nowadays, they get an average of one to two such requests per day.
Dr. Parikh explained, “In foreign countries, the dead bodies are given a respectful farewell and they are taken to the crematorium in a well-decorated Mercedes or a Rolls Royce. Crematoriums there are a place of peace and greenery with a planned set up, but in India the situation is totally opposite. I want the same type of respect for the dead here too and my Antim Samskar Seva is just an effort in this direction.”
The doctor added that a simple last rite in Hindus requires at least 24 articles. “After the death of a family member, when the entire family mourns, they have the responsibility of performing the last rites too. In such a scenario, all the preparations happen in a scattered manner. Here’s where our team provides them with expert, humble service without depending on the deceased’s family for as little as a match box.”  
He further revealed, “We execute the whole process quietly and discreetly and also ensure that the ashes are recovered and handed over to the family. We also help the family members to donate the organs of the dead on their request as well as complete the formalities to obtain the official death certificate from the BMC.” 
The journey…
In 1982, Dr. Parikh’s father met with an accident and was admitted to J.J. Hospital, where he died. His father’s body was then put in a hearse provided by the hospital van, which had blood stains and was filthy. While transporting his father’s body to Pedder Road, the hearse van developed some mechanical problems. Later, his father’s body was taken in another hearse. After witnessing the disrespect to his father’s body, Dr. Parikh decided that, in the future, he will do something in this regard. It led to the formation of the Antim Samskar Seva in 2008.
The team
Antim Samskar Seva consists of…
  • A coordinator (social worker), two helpers and a driver in uniforms
  • Seating facility for a few mourners
  • Bottled water with disposable cups
  • Spiritual recitations or chanting of religious shlokas in the background (on demand of the family)
  • All the requisites like earthen pot, bier/ stretcher (ready to use), flowers/garlands, salt, ghee, etc.
(Antim Samskar Seva can be contacted on 9223355500/ 9223355511. E-mail: contact@antimseva.com)

Monday, December 7, 2009

भोपाल गैस त्रासदी एक बेबस चीख जो दम तोड़ रही है...

देश के इतिहास के सबसे भयावह नरसंहारों में से एक भोपाल गैस त्रासदी अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर चूका h. देश की न जाने कितनी सदियों से चली आ रहे परम्पराओं का पालन करते हुए देश के हर कोने में तीन दिसम्बर को मोमबत्तियां, दीपक, मशाल, रैलियां, प्रभात फेरियां निकालकर इस त्रासदी में अपनी जानें गवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी जा रहीं हैं. करीब 2० हजार से भी ज्यादा लोंगों को मौत की नींद सुलाने वाले इस यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से निकले जहरीले गैस ने आज भी अपने निशान उन मासूम लोगों की ज़िन्दगी पर दिखा रहा हैं जिसे देख कर और समझ कर कोई बिरला ही होगा जिसके मन में उनके लिए कोई संवेदना न उभरे.

हाँ सर्कार और न्याय व्यवस्था की संवेदना जागी तभी तो इस त्रासदी के शिकारों को सर्कार ने करीब बारह हजार रुपयों की राशी बतौर मुआवजा दिया है वहीँ ९० का दशक में उपहार सिनेमा में बोर्डर फिल्म देखते हुए जलकर मरे लोगों के परिजनों को करीब १२ लाख का मुआवजा मिला इस मुआवजे के भेदभाव से शायद इस देश का कानून जो सबके लिए एक है जैसा देश के संविधान में अब तक हम सुनते और पढ़ते आ रहे है को ही चरितार्थ कर रहा है.

इन २५ सालों में न जाने कितने कागज़ इन भुक्तायोगियों के बारे में लिखकर दुनिया भर के अख़बारों ने बर्बाद कर दिए होंगे और न जाने कितनी बार हम जैसे नौजवान इन सब ख़बरों को पढ़कर उस भयावह दृश्य जिसमे एक नवजात शिशु की लाश पर जिसकी सिर्फ आँखें ही दिखती हैं और उसपर मिटटी दाल कर दफनाया गया है देखकर रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव से भर जाते रहे हैं पर न जाने क्यूँ इन्हें कथित न्याय दिलाने का जिम्मा उठाने का ढोंग करने वाले लोकतंत्र  के चारों स्तंभों की संवेदना इनके प्रति नहीं जागती? २५ साल किसी के भी जीवन का एक बड़ा हिस्सा होता है जो कई खुशियों से भरा होता है जिसमे उसकी आने वाली साड़ी ज़िन्दगी की बुनियाद टिकी होती है और आज के इस तेज भागते दुनिया में तो ये किसी सदी से कम नहीं हो सकता.

पर शायद इस देश के आम जनता का दुर्भाग्य ही है की उसकी पुकार केवल पुकार ही बन कर रह जाती है जो किसी मोर्चे या किसी रैली में सिसक सिसक कर दम तोड़ देती है और कहीं से अगर गलती से संविधान की इन चारों स्तंभों से न्याय हो भी जाता है तो तब तक उस न्याय ke हक़दार को दम तोड़े कई दशक बीत चुके होते है. ऐसा नहीं है की हमारे देश के
ये चरों स्तम्भ कोई कार्य नहीं कर रहे हैं अरे भाई आप अगर अख़बार पढ़ते होंगे तो देख ही रहे होंगे. लोकतंत्र  का पहला स्तम्भ विधायिका (अरे भाई संसद) कई विषयों पर बहस कर रही है (जिसमे नेता नदारद हैं) जैसे महंगाई को कैसे रोकें, कृषि मंत्री करीब दो साल से इस पर चर्चा कर रहें हैं जिसका फल येही है की अब तक दाल जो आम थी अब आम क्या अमीरों के जेब के औकात से भी बाहर हो चुकी है, देश की विकास दर को ९ प्रतिशत पर कैसे लायें, पाकिस्तान को कैसे कितने कड़े शब्दों से वार करें (याद रखें केवल शब्दों से हथियारों से नहीं).

कार्यपालिका यानी दूसरा स्तम्भ अरे भाई प्रशाशन भी काम कर रही है की कैसे छठवे वेतन आयोग को जल्दी से लागू कराया जाए और जनता जिसकी उन्हें सेवा करनी है वह भाद में जाये usase इन्हें कोई मतलब नहीं है. सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ जिसकी तरफ हर कोई बड़ी ही बेचैनी और विश्वास के साथ ताकता है - अदालत- काम कर रही है ना- अरे भाई अपने दो भाई हैं ना अम्बानी ब्रदर्श उनका मामला अभी कहाँ सुलझा है जो देश के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और किसी अमीरजादे को बेल (जमानत) भी तो दिलवानी है नहीं तो उआकी बीमार माँ चुनाव हार जाएगी और वह अमीरजादा किसी बार में पैसे भी नहीं उड़ा पायेगा.       

माफ़ कीजियेगा आखिरी स्तम्भ पत्रकारिता जिसका एक सदस्य मैं भी हूँ को कैसे भूल सकता हूँ, भाई हमारी बिरादरी तो धोनी, शाहरुख़, अमिताभ में इतनी ब्यस्त है की उसे फुर्सत कहाँ है दिन रात आरुशी,  मधुमिता कोड़ा जैसे मामलों में इतना मसाला है मी और किसी चीज पर ध्यान ही नहीं लगता. अच्छा हम क्या बात कर रहे थे अरे हाँ भोपाल गैस त्रासदी देखा आपने कैसी गजनी से भी कमजोर याददास्त हो गयी है हमारी.

अरे भाई भोपाल त्रासदीवालों कई बार पैदल दिल्ली गए हो ना चलो इस बार रजत जयंती पर फिर से चले जाओ वहां पर हमारे मनमोहनजी हैं, प्रतिभाजी अरे भाई राष्ट्रपति मैडम जिन्हें अभी अख़बार में सुखोई में बैठते हुए देखे थे ना वहीँ क्या पता आपकी समाश्या भी वे सुखोई के स्पीड से निपटा दें और बहुत खादी धारी लोग हैं जिनपर इस देश का बहुत भारी बोझ है और वे सब इसी बोझ के दबाव के चलते वे सब मोटे भी हो गए हैं.

अच्छा एक और बात याद आई कई फिल्म देखीं हैं जिसमे हीरो ये भी कहता है की न्याय मांगने से नहीं छीनने से मिलते है और कुछ लोग जिन्हें लाल सलाम वाले भी कहा जाता है वे छीनकर भी ले रहे हैं हाँ याद आया उन्हें नक्शली कहते हैं उन्हें भी ज्वाइन कर सकते हैं. अरे भाई सही कह रहे हो सरकार उन्हें पूरी तरह ख़तम करने पर तुली है हाँ वे आतंकवादी जो कहला रहे हैं क्यूंकि वे अपना अधिकार जो मांग रहे हैं जो उन्हें लोकतंत्र में अब तक नहीं मिला और अब उसी को पाने के लिए वे हथियार उठा लिए हैं. क्या सरकार या पुलिस मार डालेगी अगर उनके साथ हो लिए तो तो भैया इन २५ सालों से उस गैस त्रासदी से पता नहीं कितनी बिमारियों का शिकार होकर क्या ख़ाक जी रहे हो? अरे माफ़ कीजिये मैं तो इमोशनल  हो गया था. मुझे माफ़ कीजिये पता नहीं क्या क्या बकता रहता हूँ? फिर मिलेंगे आपकी त्रासदी के अगली बरसी पर. तब तक के लिए हे भोपाल गैस त्रासदी वालों शुभ यात्रा सॉरी दुःख भरी यात्रा आपको मुबारक हो.

कप्तान माली