Monday, December 7, 2009

भोपाल गैस त्रासदी एक बेबस चीख जो दम तोड़ रही है...

देश के इतिहास के सबसे भयावह नरसंहारों में से एक भोपाल गैस त्रासदी अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर चूका h. देश की न जाने कितनी सदियों से चली आ रहे परम्पराओं का पालन करते हुए देश के हर कोने में तीन दिसम्बर को मोमबत्तियां, दीपक, मशाल, रैलियां, प्रभात फेरियां निकालकर इस त्रासदी में अपनी जानें गवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी जा रहीं हैं. करीब 2० हजार से भी ज्यादा लोंगों को मौत की नींद सुलाने वाले इस यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से निकले जहरीले गैस ने आज भी अपने निशान उन मासूम लोगों की ज़िन्दगी पर दिखा रहा हैं जिसे देख कर और समझ कर कोई बिरला ही होगा जिसके मन में उनके लिए कोई संवेदना न उभरे.

हाँ सर्कार और न्याय व्यवस्था की संवेदना जागी तभी तो इस त्रासदी के शिकारों को सर्कार ने करीब बारह हजार रुपयों की राशी बतौर मुआवजा दिया है वहीँ ९० का दशक में उपहार सिनेमा में बोर्डर फिल्म देखते हुए जलकर मरे लोगों के परिजनों को करीब १२ लाख का मुआवजा मिला इस मुआवजे के भेदभाव से शायद इस देश का कानून जो सबके लिए एक है जैसा देश के संविधान में अब तक हम सुनते और पढ़ते आ रहे है को ही चरितार्थ कर रहा है.

इन २५ सालों में न जाने कितने कागज़ इन भुक्तायोगियों के बारे में लिखकर दुनिया भर के अख़बारों ने बर्बाद कर दिए होंगे और न जाने कितनी बार हम जैसे नौजवान इन सब ख़बरों को पढ़कर उस भयावह दृश्य जिसमे एक नवजात शिशु की लाश पर जिसकी सिर्फ आँखें ही दिखती हैं और उसपर मिटटी दाल कर दफनाया गया है देखकर रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव से भर जाते रहे हैं पर न जाने क्यूँ इन्हें कथित न्याय दिलाने का जिम्मा उठाने का ढोंग करने वाले लोकतंत्र  के चारों स्तंभों की संवेदना इनके प्रति नहीं जागती? २५ साल किसी के भी जीवन का एक बड़ा हिस्सा होता है जो कई खुशियों से भरा होता है जिसमे उसकी आने वाली साड़ी ज़िन्दगी की बुनियाद टिकी होती है और आज के इस तेज भागते दुनिया में तो ये किसी सदी से कम नहीं हो सकता.

पर शायद इस देश के आम जनता का दुर्भाग्य ही है की उसकी पुकार केवल पुकार ही बन कर रह जाती है जो किसी मोर्चे या किसी रैली में सिसक सिसक कर दम तोड़ देती है और कहीं से अगर गलती से संविधान की इन चारों स्तंभों से न्याय हो भी जाता है तो तब तक उस न्याय ke हक़दार को दम तोड़े कई दशक बीत चुके होते है. ऐसा नहीं है की हमारे देश के
ये चरों स्तम्भ कोई कार्य नहीं कर रहे हैं अरे भाई आप अगर अख़बार पढ़ते होंगे तो देख ही रहे होंगे. लोकतंत्र  का पहला स्तम्भ विधायिका (अरे भाई संसद) कई विषयों पर बहस कर रही है (जिसमे नेता नदारद हैं) जैसे महंगाई को कैसे रोकें, कृषि मंत्री करीब दो साल से इस पर चर्चा कर रहें हैं जिसका फल येही है की अब तक दाल जो आम थी अब आम क्या अमीरों के जेब के औकात से भी बाहर हो चुकी है, देश की विकास दर को ९ प्रतिशत पर कैसे लायें, पाकिस्तान को कैसे कितने कड़े शब्दों से वार करें (याद रखें केवल शब्दों से हथियारों से नहीं).

कार्यपालिका यानी दूसरा स्तम्भ अरे भाई प्रशाशन भी काम कर रही है की कैसे छठवे वेतन आयोग को जल्दी से लागू कराया जाए और जनता जिसकी उन्हें सेवा करनी है वह भाद में जाये usase इन्हें कोई मतलब नहीं है. सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ जिसकी तरफ हर कोई बड़ी ही बेचैनी और विश्वास के साथ ताकता है - अदालत- काम कर रही है ना- अरे भाई अपने दो भाई हैं ना अम्बानी ब्रदर्श उनका मामला अभी कहाँ सुलझा है जो देश के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और किसी अमीरजादे को बेल (जमानत) भी तो दिलवानी है नहीं तो उआकी बीमार माँ चुनाव हार जाएगी और वह अमीरजादा किसी बार में पैसे भी नहीं उड़ा पायेगा.       

माफ़ कीजियेगा आखिरी स्तम्भ पत्रकारिता जिसका एक सदस्य मैं भी हूँ को कैसे भूल सकता हूँ, भाई हमारी बिरादरी तो धोनी, शाहरुख़, अमिताभ में इतनी ब्यस्त है की उसे फुर्सत कहाँ है दिन रात आरुशी,  मधुमिता कोड़ा जैसे मामलों में इतना मसाला है मी और किसी चीज पर ध्यान ही नहीं लगता. अच्छा हम क्या बात कर रहे थे अरे हाँ भोपाल गैस त्रासदी देखा आपने कैसी गजनी से भी कमजोर याददास्त हो गयी है हमारी.


अरे भाई भोपाल त्रासदीवालों कई बार पैदल दिल्ली गए हो ना चलो इस बार रजत जयंती पर फिर से चले जाओ वहां पर हमारे मनमोहनजी हैं, प्रतिभाजी अरे भाई राष्ट्रपति मैडम जिन्हें अभी अख़बार में सुखोई में बैठते हुए देखे थे ना वहीँ क्या पता आपकी समाश्या भी वे सुखोई के स्पीड से निपटा दें और बहुत खादी धारी लोग हैं जिनपर इस देश का बहुत भारी बोझ है और वे सब इसी बोझ के दबाव के चलते वे सब मोटे भी हो गए हैं.

अच्छा एक और बात याद आई कई फिल्म देखीं हैं जिसमे हीरो ये भी कहता है की न्याय मांगने से नहीं छीनने से मिलते है और कुछ लोग जिन्हें लाल सलाम वाले भी कहा जाता है वे छीनकर भी ले रहे हैं हाँ याद आया उन्हें नक्शली कहते हैं उन्हें भी ज्वाइन कर सकते हैं. अरे भाई सही कह रहे हो सरकार उन्हें पूरी तरह ख़तम करने पर तुली है हाँ वे आतंकवादी जो कहला रहे हैं क्यूंकि वे अपना अधिकार जो मांग रहे हैं जो उन्हें लोकतंत्र में अब तक नहीं मिला और अब उसी को पाने के लिए वे हथियार उठा लिए हैं. क्या सरकार या पुलिस मार डालेगी अगर उनके साथ हो लिए तो तो भैया इन २५ सालों से उस गैस त्रासदी से पता नहीं कितनी बिमारियों का शिकार होकर क्या ख़ाक जी रहे हो? अरे माफ़ कीजिये मैं तो इमोशनल  हो गया था. मुझे माफ़ कीजिये पता नहीं क्या क्या बकता रहता हूँ? फिर मिलेंगे आपकी त्रासदी के अगली बरसी पर. तब तक के लिए हे भोपाल गैस त्रासदी वालों शुभ यात्रा सॉरी दुःख भरी यात्रा आपको मुबारक हो.

कप्तान माली
मुंबई
     

Wednesday, November 25, 2009

२६/११ शर्म दिवस की एक टीस

जय हिंद दोस्तों।
आज पहली बार करीब एक साल पहले रजिस्टर किए इस ब्लॉग पर मैं कुछ पोस्ट कर रहा हूँ। कारण बहुत से हैं इसके पीछे पर एक बात जरूर साफ़ है की लिखना बहुत कुछ चाहता था। फिर भी देर से ही सही आज समय निकलकर कुछ लिखा रहा हूँ शायद यह मेरी टीस हो पर यह कहीं तो निकालनी चाहिए वरना यह एक नासूर बन सकती है.

दोस्तों आज भारत के इतिहास में २६/११ के नाम से जुड़ा एक काला अध्याय जो न केवल भारत को बल्कि इसके कथित गौरवशाली संस्कृति को भी कलंकित कर रहा है जिस पर कोई भी बाहर से आकर हमला कर सकता है और हमारी मुंबई पुलिस जो ख़ुद को दुनिया की सबसे सर्वश्रेष्ठ पुलिस में शुमार कराती है के लिए तो मानों यह आतंकवादी हमला किसी बलात्कार से कम नहीं है जो सामूहिक रूप से पूरी दुनिया के सामने किया गया है फिर भी यह मुंबई पुलिस किसी वेश्या की तरह फिर से बाज़ार में धंदे के लिए खड़ी दिख रही है.

और ये अगर काफी नहीं था तो हमारे नेतागण और बाबु लोग देश की इस मैली चादर को पुरी दुनिया के सामने बतौर सबूत पेश करते घूम रहे हैं की देखो हमारे साथ बलात्कार हुआ है. मैं यह दोष उन निचले दर्जे पर तैनात पुलिस जवानों को नहीं बल्कि देश के सबसे कठिन परीक्षा को पास करके आइपीएस बनने वाले अफसरों पर मध् रहा हूँ जिनका यह कर्तव्य था की उस मुंबई जिसने हमेशा से सबसे ज्यादा टैक्स नरक की ज़िन्दगी जीते हुए सिर्फ़ इसलिए दिया है की पुरा देश विकास कर सके और देश सुरक्षित नींद सो सके पर छठवें पे कमीशन की मलाई काटने वाले और रात हसीन पार्टियों में बिताने वाले इन अफसरों की चमड़ी इतनी मोटी हो गई है की इनपर संवेदना का कोई भी हथियार नहीं असर करता।

आज इस दुखदायी हृदयविदारक कलंकित घटना को एक साल पुरे हो रहे हैं कईयों के आंखों में (जिनकी संवेदना अब भी जीवित है) आंसूं दिख रहे हैं और हर कोई मोमबत्तियां या फूल लेकर या मन ही मन उन शहीदों और मृत आत्माओं को श्रधांजलि दे रहे हैं और वहीं दूसरी ओर मुंबई पुलिस जो इस शहर को आतंकियाँ से नहीं बचा पाई वोह फिर से एक शर्मिंदगी की हदें पार करते हए अपना शक्ति प्रदर्शन मुंबई की उन स्थानों पर जहाँ उन आतंकियों ने आतंक मचाया था पूरे साजों सामन के साथ कर रही है। करीब पाँच साल मुंबई की पत्रकारिता के बावजूद मुझे यह नहीं समझ आ रहा है की यह शक्ति प्रदर्शन क्या दर्शाता है? हमारी मजबूती या हमारे पुलिस फोर्स की लाचारी जो उस वक्त कुछ भी नहीं कर सके यहाँ तक की स्वयं पुलिस कमिश्नर और डीजीपी भी असहाय दिखे और लीडरशिप की तो बात ही बेमानी थी।
ऐसे में सवाल येही रह जाता है की आख़िर आम जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन अफसरों पर हो या जनता अपनी सुरक्षा स्वयम करे। ऐसा नहीं है की २६/११ हमले के बाद पुलिस ने कुछ सीख ली होगी पर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहें हैं क्यूंकि इन साल भर में ही पाकिस्तानी नागरिक आतंकवादी हेडली और राणा ने पुरे शहर का मुआयना करके गए और मुंबई पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी जब तक एफ बी आई ने इसका खुलाशा नहीं किया होता। यानि एक बात साफ़ है की अब भी देशवाशियों की जान आतंकवादियों के ही दया पर सुरक्षित है क्यूंकि मुंबई पुलिस वापस शक्ति प्रदर्शन के बाद अपनी मांद में जाकर सो जाएगी और आतंकवादी किसी भी कोने से यहाँ पर प्रवेश करके हमारे देश की कथित अस्मिता को तार तार करने में सफल हो जायेंगे। आज हम सब को जरुरत है की हम ख़ुद इतने सक्षम हो जाए की हम अपनी सुरक्षा स्वयम कर सके न की इनके भरोशे बैठे.

इन सब घटनाओं से बचपन में स्कूल में गुनगुनाये जमे वाले देशभक्ति गीत 'बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनिया , देखों कहीं बर्बाद न हो जाए ये बगीचा, इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के' याद आ रही है। इस उम्मीद के साथ की आना वाला कल इस तरह की घटनाओं से महरूम हो और पुरे विश्व का मंगल हो। जय हिंद जय भारत।
आपका कप्तान माली
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