Tuesday, September 6, 2011

13/7 helpless mumbai and hopeless government

मुंबई फिर दहली. मुंबई के सीने पर फिर से आतंकवादियों ने हमला किया. मुंबई के दादर, ओपेरा हाउस और झवेरी बाज़ार में सिरिअल ब्लास्ट में करीब २० की मौत.


१३ जुलाई बुधवार की शाम को जब लोग अपने दफ्तरों से अपने घर पहुंचे या रास्तों में थे तब टेलीविजन स्क्रीन या मोबाइल के एसएम्एस पर यह खबर देख कर उनका चौकना लाजमी था पर देश की आर्थिक राजधानी में रहने वाले हर एक शख्स की जुबान और आँखों में एक सवाल भी था आखिर हर बार हम मुंबईवासी ही क्यों आतंक के शिकार होते हैं? देश के हर कोने से यहाँ आकर दिन रात मेहनत करके क्या हमें सुरक्षित जीवन जीने का भी अधिकार नहीं है? देश में सबसे ज्यादा टैक्स देने के बाद भी क्या हमे थोड़ी सी सुरक्षा नहीं मिल सकती क्या? क्या मुंबई भी पाकिस्तान के शहरों कि तरह हो गयी है जहाँ दिन पत्रिदीन धमाके होते हैं? क्या हेमे अब धमाकों के साथ जीने कि आदत डाल लेनी चाहिए? क्या मुंबई भी पाकिस्तान के शहरों कि तरह हो गयी है जहाँ दिन पत्रिदीन धमाके होते हैं? क्या हेमे अब धमाकों के साथ जीने कि आदत डाल लेनी चाहिए?

मुंबई वासियों को अपने इन सवालों का जवाब कहीं भी नहीं मिल रहा है और इस हताशा और गुस्से में मुंबई में सभी के मोबाइल पर एक एसएम्एस घूम रहा था ' हम सरकार से कसाब और अफज़ल गुरु को फासिं देने कि मांग नहीं करते पर कम से कम सरकार हमें उनके जैसी सुरक्षा तो दे.' मुंबई वासियों कि भड़ास इस एसएम्एस से सीधे झलकती है.

जिन जगहों पर ये धमाके हुए वे मुंबई के सबसे अमीर इलाकों में से एक हैं जहाँ पर सोने (झवेरी बाज़ार), चांदी (दादर) और हीरे (ओपेरा हॉउस) का करोडो का व्यापार होता है. मुंबई का सबसे पुराना मार्केट होने के कारण यहाँ पुरे देश के व्यापारियों का जमघट लगता है साथ ही यहाँ हर समय भीड़ रहती है. जिसके चलते झवेरी बाज़ार (२००३) और दादर (१९९३) में ये हमले दुबारा हो चुके हैं. हर बार आतंकवादियों ने ऐसी जगहों को निशाने पर लिया है जहाँ पर ज्यादा से ज्यादा जान और माल का नुकसान हो. मुंबई का धनाढ्य वर्ग जो इन बाज़ारों में व्यापार करते हैं या यहाँ पर अपने ऑफिस खोल रखे हैं या वे जो यहाँ इन व्यापारियों को अन्य सुविधाए मुहैया करते हैं वे ही इन हमलों के ज्यादातर चपेट में आते हैं.

ऐसा नहीं है कि यहाँ पर दुनिया में दुसरे नंबर कि पुलिस कहलाने वाली मुम्बई पुलिस हाँथ पर हाँथ धरे बैठी रहती है. मुंबई में अपराधिक घटनाएँ ना हो इसके लिए यहाँ लगभग १२ महीने धारा १४४ लगी रहती है और कभी कभी रेलवे स्टेशन पर भी चेक्किंग क जाती है साथ ही शहर के हर प्रवेश देवर पर गाड़ियों और मुसाफिरों कि तलाश कि जाती है जिसके चलते यहाँ के पुलिस वालों को करीब १६ घंटे रोजाना ड्यूटी करनी पड़ती है पर इसके बावजूद भी मुंबई को आतंकी हमलों से नहीं बचाया जा सका गया है.

ऐसा नहीं है कि यहाँ कि सरकार ने पिछले धमाकों से कुछ नहीं सीखा है पर जितनी सक्रियता सरकार को उन हमलों के बाद दिखाई जनि चाहिए थी उतनी सक्रियता नहीं बरती गयी है. मुंबई पुलिस के पास समुद्री तटों पर सुरक्षा के लिए उसे बोट दिए गए हैं पर उस पर सवार पुलिस अफसर मरीन पोलिसिंग में ट्रेंड नहीं हैं और समुद्री सीमा कि सुरक्षा किसी एक एजेंसी के पास नहीं है इसमें तट रक्षक डाल, नौसेना और लोकल पुलिस कि भागीदारी है पर तीनों अजेंसिओं के कार्य क्षेत्र कि सीमायें अलग अलग हैं और इनके बीच तालमेल का आभाव है

वहीँ दूसरी ओर राज्य के ख़ुफ़िया विभाग को एक साइड पोस्टिंग या पनिशमेंट पोस्टिंग के रूप में देखा जाता है जिसके चलते इस विभाग में अधिकारी बेमन से काम करते हैं. मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र पुलिस के बीच में कई विभाग हैं तो खुब्फिया जकारियां इकठ्ठा करते हैं पर आपस में उनका तालमेल ना होने के कारण सब बेकार जाता है. जिसका नतीजा इस तरह के धमाकों के रूप में सामने आता है. शहर कि सुरक्षा को लेकर कई समितियां बनायीं गयीं है पर उनपर अमल केवल कागज पर ही होता है..

इस मुद्दे पर डा. पी एस पसरीचा जो महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक रह चुके हैं का कहना है की मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है और यहाँ पर जनसँख्या का घनत्व पुरे देस में सबसे ज्यादा है इसलिए जितना असर इन धमाकों का यहाँ पर मिलता है वह देश के अन्य शहरों में नहीं होता है. यहाँ पर हमला करने पर जितनी सुर्खियाँ, डर, नुकसान आतंकवादी संगठन पते हैं वह अन्य कहीं नहीं मिल सकता है. मुंबई में हमला करने से यहाँ पर सीधे आघात व्यापार, विदेशी निवेश, पर्यटन और साम्प्रदायिकता पर पड़ता है.

मुंबई को सुरक्षित रखने के लिए अब हमें पुलिस विभाग में मैन पॉवर पर नहीं बल्कि टेक्नोलोजी पर देना होगा. देश को अब अमेरिका जैसे विकसित देशों की तरह आधुनिक होना पड़ेगा. हमें अब एक मॉडर्न कंट्रोल सविलेंस सेंटर की जरूरत है जहाँ से सारे शहर पर नजर रखी जा सके. मुंबई जैसे शहर को सबसे पहले उसके कोस्टल सिक्युरिटी को चाक चौबंद करने की जरुरत है क्योंकि ये चारो तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है. मुंबई पुलिस को एक अलग मरीन पुलिस की जरुरत है जो पानी के अन्दर सभी कारनामे कर सके. समुद्र में जाने वाले हर छोटे बड़े जहाज को एक इलेक्ट्रोनिक पहचान पत्र देना होगा ताकि किसी अज्ञात जहाज की एंट्री मुंबई की समुद्री सीमा में ना हो पाए इसके साथ ही समुद्री किनारों पर निगरानी के लिए जिम्मेदार सारी एजेंसिओं के बीच तालमेल भी बढ़ानी होगी. पुरे देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी अब केवल प्रशाशन के भरोशे नहीं छोड़ा जा सकता, विकसित देशों की तरह अब हमें भी काउंटर टेररिज्म के लिए अब प्राइवेट सिक्यूरिटी एजेंसियों के साथ भी हमें तालमेल बैठाना होगा. देश में होमगार्ड को भी महत्त्व मिलना चाहिए.

हमारे देश में आतंकवाद से लड़ने के लिए काफी कठोर सजा का प्रावधान होना चाहिए और इस कानून का गलत इस्तेमाल ना हो इसलिए इसका गलत इस्तेमाल करने वालों के लिए भी काम से काम ७ से १० साल के कारावास का प्रावधान होना चाहिए ताकि किसी बेगुनाह के साथ भी अन्याय ना हो सके.

मेरे ३८ वर्ष के पुलिस करियर में मैंने ये सीखा है कि आपको इंटेलिजेंस किसी आई बी या ख़ुफ़िया एजेंसी से नहीं मिलते हैं. आतंकी गतिविधियों कि ख़ुफ़िया ख़बरें जनता से आती हैं इसलिए पुलिस विभाग को जनता के मन में इस तरह कि भावना जगानी होगी कि जनता पुलिस को अपना दोस्त समझे और उससे अपनी हर बात जाहिर करे. साथ ही राजनितिक पार्टियों को मिल कर एक साथ आना चाहिए और इन समयों में एकता का और सदभाव्ना कि mishal पेश करनी चाहिए.

डा. पसरीचा का कहना है कि आतंकवाद एक सतत प्रक्रिया है और इसकी कोई गारंटी नहीं है कि जो कुछ आज मुंबई में हुआ है वह किसी अन्य शहर में नहीं होगा. इसे रोकने के लिए हमें सतत प्रयास करते रहना पड़ेगा.

भाजपा के पूर्व सांसद किरीट सोमैया १३ जुलाई को हुए ब्लास्ट कि जाँच को तेजी से आगे बढ़ने कि मांग सरकार से कर रहे हैं और इन्हीं के चलते जुलाई २००६ को हुए ट्रेन ब्लास्ट के पीड़ितों को भी न्याय दिलाने के लिए कई स्तर पर लड़ रहे हैं. सोमैया का कहना है कि मुंबई पर बार बार हमला करने के पीछे पहला कारन ये है कि यहाँ पर हमला करने से आतंकवादी संगठनों को ग्लोबल पब्लिसिटी मिलिती है और देश कि आर्थिक राजधानी होने के नाते यहाँ पर इसका असर भी ज्यादा देखने को मिलता है. रही बात उनके बार बार हमले का तो यहाँ कि सरकार का ये नाकारापन है जिसके चलते अब तक १९९३ के धमाकों के गुनाहगारों को हम सजा नहीं दिला पाए ज्सिके चलते उनका आत्मविश्वास और भी बढ़ जाता है. दूसरा कारण यहाँ के नेता किसी भी आतंकवादी हमलों को राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग देने में देर नहीं लगते हैं और यही कारण है कि अच्छे पुलिस अधिकारी भी इन मामलों को सुलझाने से डरते हैं. तीसरा हमारे यहाँ कोई भी मामला इतने सालों तक चलता है कि लोग उस घटना को भूल जाते हैं और न्याय मिलना ना मिलना एक जैसा ही हो जाता है.

मुंबई ब्लास्ट और राजनीती...

१३ जुलाई के काले बुधवार को जहाँ एक ओर जनता अस्पतालों में अपनों को ढूंढ़ रही थी, कहीं लोग रक्त दान और घायलों कि सेवा में लगे थे वहीँ राज्य के भाजपा नेता पुरे दल बल के साथ अस्पतालों के बाहर कांग्रेस सरकार हाय हाय के नारे लगा रहे थे. दूसरी ओर उत्तर भारतीयों से खार खाए मनसे के अध्यक्ष राज ठाकरे ने ब्लास्ट का ठीकरा मुंबई में आने वाले परप्रान्तियों के सर मढ़ा हलाकि उन्होंने बाद में अपनी इस वन्क्तव्य का खंडन भी किया.

वहीँ राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने आर आर एस को बम कि फैक्ट्री कहते हुए और हिन्दू संगठनों कि ओर इशारे करते हुए उनकी भी जाँच करने को कहा जिसके बाद उनकी मध्य प्रदेश में उन्होंने ने विरोध झेला और विरोधियों को पीटने के चक्कर में खुद कि भी पिटाई और कपडे फ़दवा बैठे.

केंद्र सरकार में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने यह कह कर अपनी और सरकार कि खिल्ली उदवाई कि इस ब्लास्ट कि ख़ुफ़िया खबर ख़ुफ़िया विभाग के पास नहीं थी. उन्होंने ये भी कहा कि मुंबई में २६-११ के बाद शांति थी और ये धमाका करीब दो साल के बाद हुआ है.

राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने ये बयां देकर राजनितिक माहौल गरमा दिया कि कांग्रेस ने गृह विभाग सहयोगी पार्टी एनसीपी को देकर गलती की यह विभाग कांग्रेस को अपने ही पास रख्ना चाहिये था. वहीँ हर बार कि तरह नाकाम गृहमंत्री आर आर पाटिल करीब दो घंटे के बाद मुंबई पहुंचे. पाटिल जैसे ही नागपुर के लिए फ्लाईट से मुंबई से निकले ही थे वैसे ही उनके सहयोगी के मोबाइल पर ब्लास्ट कि सूचना आई पर फ्लाईट उनके लाख कोशिशों के बावजूद नहीं रुकी और उन्हें नागपुर जाकर वापस मुंबई आना पड़ा.



ब्लास्ट के बाद...

इस धमाके के बाद ओपेरा हॉउस के हीरा व्यापारी जल्दी ही मुंबई के पौस इलाके बांद्रा कुर्ला काम्प्लेक्स में करीब साल भर से बन कर तैयार भारत बोर्स हॉउस में शिफ्ट होने का मन बना लिया है. कुछ मुंबई और सूरत (जहाँ पर सबसे ज्यादा हीरे का व्यापार और इस से जुड़े अन्य व्यवसाय है) के व्यापारियों ने सरकार से मांग कि है कि उनके लिए सूरत के एअरपोर्ट पर दुबई और मुंबई के लिए कम से कम एक सीधी विमान सेवा शुरू कर दी जाये तो वे मुंबई से सूरत शिफ्ट हो जाएँ जहाँ पर उन्हें कम लागत में सुअर्क्षित रूप से व्यापार करने का साधन हो जायेगा. फ़िलहाल उन्हें रोजाना कीमती हीरों के साथ मुंबई और सूरत के बीच करीं ६ घंटे का ट्रेन का सफ़र करना पड़ता है जो कभी कभी खतरनाक भी हो जाता है.

वहीँ पुलिस ने पुरे शहर में ५००० नए सी सी टी वी कैमरा लगाने में जुट गयी है ताकि पुरे शहर पर नजर रखी जा सके. हालाँकि इस धमके में भी सी सी टी वी फुटेज में संदेहास्पद आतंकी का विडियो मिला है पर सवाल ये है कि का केवल सी सी टी वी कैमरा लगाने से ही काम नहीं चल पायगा क्या इन फुटेज पर नजर रखने के लिए कोई अधिकारी कि नियुक्ति भी की जाएगी?



मुंबई में अब तक हुए धमाके...

१९९३ के सीरिअल धमाके : १२ मार्च १९९३ को दोपहर के १:३० और ३:३५ के बीच मुंबई में १३ स्थानों पर हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों से मुंबई को पहली बार इस बम कि भयावहता का एहसास हुआ था जिसमे सरकारी आंकड़ों के मुताबिक २५७ लोगों कि जाने गयीं तथा ७१३ लोग घायल हुए. इस धमाके कि सुनवाई १९९५ में शुरू हुई और ६८६ गवाहों को सुनने और ३५००० पन्नों के सबूतों को पढने के बाद इसके नतीजे ११ साल बाद आये जिसमे १२९ दोषियों में से १०० को सजा हुई.

२००३ गेट ऑफ़ इंडिया और झवेरी बाज़ार धमाके: गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए २५ अगस्त २००३ को किये गए इस धमाके में ५३ लोगों कि जाने गयीं और करीब १५० लोगों कि जाने गयीं.

२००६ सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट

११ जुलाई २००६ को हुए इस ब्लास्ट में ११ मिनट में सात धमाके लोकल ट्रेन में हुए जिसमे १८७ जाने गयीं और ८०० से भी ज्यादा घायल हुए. १९९३ के बाद मुंबई वासियों ने धमाके कि भयावहता देखि.

२६/११ मुंबई हमला

२६ नवम्बर २००९ को हुए इस हमले में १६४ कि मौत हुई और करीब ३०० से ज्यादा हायल हुए. यह पहली बार हुआ जब समुद्र के रस्ते आये पाकिस्तानी आतंकियों को हमने देखा और १० अतान्क्यों में से एकमात्र आतंकी कसाब अब भी मुंबई के आर्थर रोड जेल में बंद है.

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